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[Essay On 75th Independence Day Of India] [Azadi Ka Amrit Mahotsav Essay in English]

स्वामी विवेकानन्द पर निबंध (Essay on Swami Vivekananda in Hindi)

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स्वामी विवेकानन्द पर निबंध
Essay on Swami Vivekananda in Hindi

🗣️ स्वामी विवेकानन्द पर निबंध (Essay on Swami Vivekananda in Hindi) पर यह निबंध बच्चो (kids) और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

प्रस्तावना

हमारे देश भारत में कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने समय समय पर अपने ज्ञान और कर्तत्व से सारे संसार को एक नयी दिशा दी है। एक ऐसे ही व्यक्ति थे – स्वामी विवेकानंद। स्वामी विवेकानंद का संसार का हर व्यक्ति जानता है, उन्हें किसी भी परिचय की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने 19 वीं सदी के अंतिम वर्षों में भारत व हिंदू धर्म का वैश्विक मंचों पर प्रतिनिधित्व किया और अपनी कर्मठता व ज्ञान से लाखों की संख्या में लोगों का उद्धार किया। 

आधुनिक युग में वे ऐसे एकमात्र व्यक्ति थे जिनसे गुलामी से मुक्ति पाने के लिये संघर्ष कर रहे हजारों की संख्या में क्रांतिकारियों और युवाओं ने प्रेरणा ली थी। आइये इस निबंध में हम स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनके द्वारा किये गए कार्यों के संबंध में विस्तार से जानने की चेष्टा करेंगे।

स्वामी विवेकानंद का जन्म, शिक्षा तथा बचपन

स्वामी विवेकानंद का जन्म पश्चिम बंगाल के कोलकाता में वर्ष 1893 ई0 की 12 जनवरी को हुआ था। इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। इनके पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाइकोर्ट में वकील थे। इनकी पारिवारिक स्थिति काफी समृद्ध और संप्नन्न थी। माता भुवनेश्वरी देवी एक गृहिणी थीं तथा धार्मिक कार्यों में रुचि रखती थीं। 

विवेकानंद के बचपन का नरेन्द्र नाथ दत्त था। इनकी परिवार वाले इन्हें बिले कहकर पुकारते थे। प्रारम्भ से ही नरेन्द्र की बुद्धि कुशाग्र एवं तीव्र थी। कई बार तो नरेन्द्र परीक्षा की तैयारी परीक्षा से एक दिन पहले ही विभिन्न किताबों को पढ़कर करते थे और अच्छे अंक लाते थे। 

नरेन्द्र अपने मित्रों के साथ वृक्षों पर चढ़कर खूब खेला करते थे। एक बार किसी बुजुर्ग ने इन्हें यह कहकर डराया कि इस वृक्ष पर एक शैतान रहता है। और वृक्ष पर चढ़ने से मना किया। तो नरेंद्र ने बिना किसी डर के  उस पेड़ पर चढ़कर बहुत समय तक वहाँ रहकर अपने मित्रों के समक्ष यह सिद्ध कर दिया कि इस वृक्ष पर कोई शैतान नहीं रहता। अगर ऐसा होता तो अब वह हमें मिल न गया होता।

इस प्रकार नरेन्द्र के भीतर साहस, बुद्धिमत्ता, तर्किक क्षमता, शारीरिक सौष्ठव आदि अनेकों गुणों विकसित हो गए थे। बाद में जब ये स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने जाने लगे तो इन्होंने स्वयं कहा, मैं अपने ज्ञान के विकास के लिये अपनी माता का ऋणी हूँ। 

रामकृष्ण परमहंस के साथ नरेन्द्र नाथ

नरेन्द्र के एक मित्र ने इन्हें दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण परमहंस के पास जाने की सलाह दी। अपनी धार्मिक रुचियों की गहनता के कारण नरेन्द्र ने अपने लिये आया हुआ विवाह का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया था। रामकृष्ण परमहंस का नाम इन्होंने अपने कॉलेज के प्राचार्य विलियम हेस्टी से भी सुन रखा था।

रामकृष्ण के पास जाने से पूर्व नरेन्द्र कई अन्य धार्मिक आचार्य के पास गए और ईश्वर के संबंध में अपनी जिज्ञासा व्यक्त की थी। परंतु किसी से भी उन्हें संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था। अंतत जब वे रामकृष्ण के पास पहुँचे तो उन्होंने रामकृष्ण से भी सीधा वही प्रश्न किया, “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” रामकृष्ण परमहंस ने नरेन्द्र की क्षमता व कौशल को भाँप लिया था। इसलिये उन्होंने उत्तर दिया, “हाँ देखा है, वैसे ही जैसे अभी तुझे देख रहा हूँ। पर ईश्वर के लिये रोता कौन है? अगर सच्चे हृदय से हम ईश्वर के लिये रोयें तो वो दौड़कर हमारे पास आएंगे।”

यहाँ से नरेन्द्र का ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के पास नियमित जाना शुरु हो गया। नरेन्द्र ठाकुर प्रश्न पूछते और अपनी जिज्ञासा को शांत करते। नरेन्द्र जब ठाकुर को माँ काली की मूर्ति के सामने पूजा करते देखता जो उसे बड़ा आश्चर्य होता। धीरे धीरे ठाकुर के संग में रहकर नरेन्द्र की विभिन्न जिज्ञासाएं शांत होने लगी। परंतु अक्समात नरेन्द्र के पिताजी को मृत्यु हो जाने के कारण बड़ा बोझ आ गया था। अपनी स्नातक की डिग्री के लेकर नरेन्द्र कड़ी धूप में नौकरी की तलाश में भटकता रहता। घर आने पर माँ से कह देता कि मित्र के घर खाना खाकर आया हूँ ताकि बाकी लोग खा सकें।

एक बार नरेन्द्र ने अपने ये हालात ठाकुर को बताए ठाकुर बोले, “मैं तो तुझसे कहता हूँ कि माँ से माँग ले, तू माँ से बोलता ही नहीं है। कल मंगलवार है, माँ के पास जाकर जो चाहे माँग लेना।” नरेन्द्र अगले दिन माँ काली के मंदिर गए और हाथ जोड़ कर खड़े रहे परंतु कुछ न माँग सके। फिर दूसरी तीसरी बार में अपने लिये वैराग्य, भक्ति, बुद्धि आदि देने की ही प्रार्थना की। ठाकुर को जब ये पता चला तो बोले, “यह तो तेरी परीक्षा थी। अगर तू सांसारिक चीजें  के जगह वैराग्य और भक्ति माँगकर तूने सिद्ध कर दिया कि तू बड़ा त्यागी है।”

संन्यासी के रूप में नरेन्द्र

अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की महासमाधि के बाद नरेन्द्र और उनके कुछ साथियों ने मिलकर किसी कमरे को किराए पर लिया और वहाँ भजन, कीर्तन व ध्यानादि करने लगे। कुछ समय बाद नरेन्द्र सहित 12 लोगों मिलकर विधिवत संन्यास ग्रहण किया। नरेन्द्र के संन्यास पर उनके परिवार वालों तथा माता के विरोध अवश्य हुआ पर उन्होंने नरेन्द्र की निर्णय को भी अपनी समझ के दायरे में रखा। 

ठाकुर ने नरेन्द्र को संकेत दे दिया था कि भविष्य में तुझे माँ का बहुत सारा कार्य करना है। उसके पहले तुझे समाधि की राह वापस नहीं मिलेगी। संन्यास के पश्चात नरेन्द्र ने अपना नाम स्वामी विविदिषानन्द रखा था। 

1893 के विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद

विश्व धर्म महासभा से पहले स्वामी विवेकानंद की प्रतिभा से केवल भारत में रह रहे चंद भारतीय लोग ही परिचित थे। परंतु 1893 के धर्म सम्मेलन में उन्होंने जो भाषण दिया उसके बाद हर समाचार पत्र पर उनके सम्मान में कई लेख लिखे गए। वे केवल अमेरिका नहीं सारे विश्व में प्रसिद्ध हो गए। 

इसके बाद स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका व इंग्लैंड आदि देशों में कई यात्राएं की तथा बड़ी संख्या में विशाल जनसमूह के सम्मुख भाषण दिए। विदेशों में उनके पास किसी भी सुख सुविधा का अभाव नहीं था परन्तु रह‌ रह कर उन्हें अपने देश की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियां कचोटती थीं। कई रातें वे अपनी मात्रभूमि की याद में ही रोते हुए बिता देते थे। 

इन पांच छह वर्षों में उन्होंने विभिन्न विषयों पर संबोधन दिए। वर्ष 1897 में भारत में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की तथा अमेरिका में वेदान्त सोसायटी की भी स्थापना की। इनके द्वारा दिए गए भाषाणों में मुख्य रूप से राजयोग, ज्ञानयोग, भक्ति योग, श्रीमद्भगवद्गीता, वेदान्त, उपनिषद आदि शामिल हैं।

भारत वापस आना और महासमाधि

जब स्वामी जी वर्ष 1896 में भारत आए तो इनके साथ भगिनी निवेदिता तथा अन्य कुछ लोग भी साथ आए। भगिनी निवेदिता का असर नाम मार्गरेट नोबल था। जब कलकत्ता में भयंकर प्लेग फैला तो भगिनी निवेदिता ने ही पीड़ितों की निस्वार्थ भाव से सेवा की। 

इसके उपरांत भी स्वामी जी कार्य नहीं थमा। वे लगातार युवा वर्ग को प्रेरित करते रहे। अंततः  4 जुलाई 1902 को स्वामी जी ने अपने बैलूर मठ में अंतिम सांस ली। 

उपसंहार

कहते हैं स्वामी विवेकानन्द जी का साक्षात जीवन ही एक उपनिषद की भांति है और यह सत्य भी है। वे खास तौर पर हर युवा के एक आदर्श हैं। वे भले ही शरीर से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनके शब्दों के रूप में आज भी हमारे साथ हैं।

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स्वामी विवेकानन्द पर निबंध (Essay on Swami Vivekananda in Hindi)

विनम्र अनुरोध

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