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विजयदशमी अथवा दशहरा पर निबंध (Essay on Dussehra or Vijayadashmi in Hindi)

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विजयदशमी अथवा दशहरा पर निबंध
(Essay on Dussehra or Vijayadashmi in Hindi)


🎃 विजयदशमी अथवा दशहरा पर निबंध (Essay on Dussehra or Vijayadashmi in Hindi) पर यह निबंध class 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए और अन्य विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए लिखा गया है।

प्रस्तावना

भारत के सभी त्यौहार में उत्साह, एकता व प्रेम की भावना से भरे हुए होते हैं। हम भारतीय इन त्यौहारों के मिल-जुलकर उत्साहपूर्वक मनाते हैं। इनमें होली, रक्षाबंधन, दीवाली और दशहरा जैसे त्यौहार कुछ प्रमुख त्यौहार हैं। दशहरा का आरम्भ त्रेता युग से हुआ था। दशहरे के दिन विभिन्न स्थानों पर बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में रावण दहन किया जाता है। रावण को बुराई का प्रतीक मानते हैं जबकि श्रीराम को अच्छाई, प्रेम व वीरता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिये जिस दिन राम ने रावण का अंत करके उसके द्वारा फैलायी जा रही सभी बुराईयों का अंत कर दिया तभी से इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। आइये अब दशहरा के संबंध अन्य जानने योग्य बातें जानते हैं।

दशहरा की शुरुआत

त्रेता युग में श्रीलंका में रावण नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली राजा था। उस समय श्रीलंका भी भारत का ही एक हिस्सा था। यूँ तो रावण एक प्रकांड विद्वान और ब्राह्मण था किन्तु बुरे कर्मों के कारण उसके वन का अंत भी बुरा ही हुआ। रावण भगवान शिव का भी एक परम भक्त था। रावण ने छल से मिथिलाकुमारी सीता को कई बार हरण करने के उपाय किये। परन्तु उसे सफलता न मिली। जब भगवान राम का विवाह सीता के साथ हुआ तो उन्हें दशरथ के कहे अनुसार 14 वर्षों के वनवास के लिये जाना पड़ा। श्रीराम के साथ सीता और लक्ष्मण भी आए। वनवास के दौरान असंख्य संघर्षों से गुजरकर तीनों अपना जीवन यापन कर रहे थे। कई प्रकार के राक्षस भी उनके मार्ग में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करते थे। 

जब रावण ने ब्राह्मण का वेश धारण कर माता सीता को छल से अपहृत किया। तो लक्ष्मण भी उन्हें बचा नहीं पाए। पक्षीराज गरूड़ ने भी रावण से लड़ते हुए अपने प्राण गवां रावण माता सीता को लंका ले गया। वह उनसे श्रीराम को छोड़ खुद को अपनाने का दुर्व्यवहार करने लगा। परन्तु माता सीता ने उसे साफ शब्दों में इंकार किया और कहा कि श्री राम अवश्य उन्हें बचाने यहाँ आएंगे। इसके उपरांत श्रीराम अपने भक्त हनुमान से मिले और वानर सेना की मदद से लंका जाने की तैयारी करने लगे। रामसेतु की मदद से पूरी वानर सेना ने सागर पार किया और लंका पर आक्रमण कर दिया। धीरे-धीरे रावण के भाई व सारी सेना को मृत्यु खाने लगी। और अंत भगवान राम ने रावण का संहार कर दिया। इस दिन का दशहरा के नाम से जानते हैं। 

रावण के अतं के बाद श्री राम माता सीता व लक्ष्मण के साथ मिलकर 14 वर्षों के वनवास के अवधि पूर करके वापस अयोध्या लौटे जहाँ उनका स्वागत अत्याधिक धूमधाम से हुआ। जिसे हम दीवाली के नाम से मनाते हैं।

दशहरा का महत्व

दशहरा एक अत्यंत महत्वपूर्ण त्यौहार है। इससे हमें जीवन में सत्य व धर्म के मार्ग पर निरंतर चलते रहने की प्रेरणा मिलती है। यह एक ऐसा त्यौहार है जो सभी प्रिय होता है। भगवान राम ने रावण को संहार कर हमें सत्य के मार्ग पर चलने की व निरंतर संघर्षरत रहने की प्रेरणा दी। दशहरा का सर्वाधिक महत्व इस बात से ही है। दूसरी ओर रावण के दस सिर हमारी बुराइयों के प्रतीक माने जाते हैं। जिनका नाश श्री राम ने किया था। हमें भी इससे यही सीख मिलती है कि अपने अंदर की बुराइय़ों का नाश करके श्री राम की भाँति एक सरल, सहज व आनंदमय जीवन को व्यतीत करें।

दशहरा मनाने के तरीके व सावधानियाँ

आजकल रावण के बड़े विशाल-विशाल पुतले बनाकर जलाने को ही दशहरा मनान समझा जाता है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं होता। रावण के पुतले तो उनके बुराइयों के प्रतीक मात्र हैं जो एक व्यक्ति अपने भीतर महसूस करता है। और उनका नाश होना अति आवश्यक होता है। इसलिये बच्चों को रावण दहन के समय इन बातों से परिचित कराना भी बेहद आवश्यक है। आजकल कई अन्य देशों के लोग भी भारत से प्रभावित होकर होली, दशहरा व दिवाली जैसे त्यौहार मनाते हैं। ये त्यौहार हमें अन्य लोगों से भी एक होने में सहायता देते हैं।

इसके अलावा भी रावण दहन के समय लोगों को, खासकर बच्चों को कुछ सावधानियाँ रखने की आवश्यकता होती है। जैसे- 

  1. रावण दहन के समय जलते पुतले के अधिक नजदीक पास खड़े न हों। कोई भी चिंगारी या पटाखे की लपट आपको चोट पहुँचा सकती है।
  2. पटाखों को हाथ में लेकर चलाना एक बहुत बड़ी असावधानी है। ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए।
  3. किसी भी ऐसी जगह पर रावण दहन नहीं करना चाहिए जहाँ बिजली के तार या खंभे हो या जहाँ आग लगने की संभावना हो।
  4. रावण दहन के समय अपने से बड़ों से आज्ञा व सुझाव अवश्य लेने चाहिए।

उपसंहार

दशहरा एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। इसका महत्ता का वर्णन उपरोक्त दिया गया है। इसमें उत्साह और उल्लास के साथ-साथ सावधानियों को ख्याल में रखते हुए भी मनाना चाहिए। दशहरा के दिन हमें श्री राम का पूजन या स्मरण अवश्य करना चाहिए। आशा है आप सभी का आगामी दशहरा उल्लास, उत्साह व प्रेम की रोशनी में जगमग होकर बीतेगा। जय श्री राम।

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