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परोपकार पर निबंध (Paropkar Par Nibandh)

👀 “परोपकार पर निबंध” पर लिखा हुआ यह निबंध (Paropkar Par Nibandh / Essay on Philanthropy in Hindi) आप को अपने स्कूल या फिर कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए निबंध लिखने में सहायता कर सकता है। आपको हमारे इस वेबसाइट पर और भी कही विषयों पर हिंदी में निबंध मिलेंगे (👉 निबंध सूचकांक), जिन्हे आप पढ़ सकते है, तथा आप उन सब विषयों पर अपना निबंध लिख कर साझा कर सकते हैं

परोपकार पर निबंध
Paropkar Par Nibandh
Essay on Philanthropy in Hindi

🗣️ परोपकार पर निबंध (Paropkar Par Nibandh / Essay on Philanthropy in Hindi) पर यह निबंध बच्चो (kids) और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए और अन्य विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए लिखा गया है।


 परोपकार अर्थात दूसरों के लिए उपकार की भावना | परोपकार के महत्व को स्वीकार करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है |

परहित सरिस धर्म नहीं भाई | 

पर पीड़ा सम नहीं अधमाई ||

अर्थात परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम धर्म नहीं है पर पीड़ा से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं है | वास्तव में परहित या परोपकार की भावना ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है |  किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते समय या किसी विपन्न व्यक्ति की सहायता करते समय हृदय को जिस असीम आनंद की प्राप्ति होती है, वह अवर्णनीय है,  वह अकथनीय है  | 

परोपकार के संबंध में हमारे ऋषि-मुनियों ने हमारे धर्म ग्रंथों में अनेक प्रकार की चर्चाएं की है केवल चर्चाएं ही नहीं अपितु उनके अनुसार अपने जीवन को जिया | जीवन की सार्थकता परोपकार में ही निहित है, इसके लिए उन्होंने जो सिद्धांत बनाए उसके अनुसार स्वयं उस पर चलें | महाभारत के प्रणेता, पुराणों के रचनाकार श्री वेदव्यास जी ने परोपकार के महत्व को विशेष रूप से स्वीकारते हुए कहा कि –

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||


अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं | पहली –परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी — पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |

परोपकार के प्रति तो प्रकृति भी सदैव तत्पर रहती है प्रकृति की परोपकार भावना से ही संपूर्ण विश्व चलाएं मान है | प्रकृति के उप दानों के बारे में कहा जाता है कि वृक्ष दूसरों को फल देते हैं, छाया देते हैं,  स्वयं धूप में खड़े रहते हैं |  नदियों स्वयं दूसरों के लिए निरंतर निवाद करती हुई बहती रहती हैं |  इस विषय में कवि ने कहा है –

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।

हमारे चारों ओर प्रकृति का घेरा है और प्रकृति अपने क्रियाकलापों से हमें परहित हेतु जीने का संदेश तथा प्रेरणा देती है |  सूर्य अपना सारा प्रकाश एवं उर्जा जगत के प्राणियों को देता है चंद्रमा अपनी शीतलता निस्वार्थ भाव से देता है |  वायु प्राणियों की जीवन प्राण बनती है, तो वर्षा जगत की तत्पता को शांत करती है | प्रकृति की परोपकार भावना को महान छायावादी कवि पंतजी ने निम्न शब्दों में उकेरा है – 

हंसमुख प्रसून हैं सिखलाते

पल भर है जो हंस पाओ

अपने उर के सौरभ से 

जग का आंगन भर जाओ

भारत सदैव से अपनी परोपकारी परंपरा के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है | यहां ऐसे लोगों को ही महापुरुष की श्रेणी में शामिल किया गया है, जिन्होंने निस्वार्थ को त्यागकर लोकहित को अपनाया | ऋषियों व तपस्वी की महिमा का गुणगान इसलिए किया जाता है  क्योंकि उन्होंने
“स्व” अपेक्षा “पर” को अधिक महत्व दिया |  भारत की भूमि ही वह पावन भूमि है जहां राम, कृष्ण, बुद्ध, एवं महावीर जैसे लोगों ने जगत कल्याण के लिए अपना राजपाट वैभव सुख सब कुछ त्याग दिया | भारत के मनीषियों ने जो उदाहरण प्रस्तुत किए ऐसे उदाहरण धरती क्या संपूर्ण ब्रह्मांड में भी नहीं सुने जाते | यहां महर्षि दधीचि से उनकी परोपकार भावना से विदित होकर देवता भी सहायता के लिए याचना करते हैं, और महर्षि अपने जीवन की चिंता किए बिना सहर्ष उन्होंने हड्डियां तक दे देते हैं 

याचक के रूप में आए इंद्र को दानवीर कर्ण अपनी जीवन रूप कवच और कुंडलों को अपने हाथ से उतार कर देते हैं | राजा रनित देव स्वयं भूखे होते हुए अतिथि को भोजन देते हैं | इस परोपकार की भावना से यहां की संस्कृति में अतिथि को देवता समझते हैं | विश्व में भारतीय संस्कृति ऐसी है जिसमें परोपकार को सर्वोपरि धर्म माना गया है | इसलिए तो हमारे धर्म ग्रंथों में सभी के कल्याण की कामना की गई है | 

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः।

सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।

मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

जीवन की सार्थकता कविवर मैथिलीशरण गुप्त ने परोपकार में ही बताई है  –

यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

यदि परोपकार को प्रक्रिया समाप्त हो जाए तो संसार ही समाप्त हो जाएगा | इसलिए प्रकृति भी लोगों के निरंतर प्रेरित करती है कि सुख में जीवन जीना चाहते हैं तो यथासंभव परोपकार करें | जिस दिन परोपकार की भावना मर्यादा को भूल जाएगा | अंततः मानव बूढ़े सिंह समूह तरह इधर-उधर ताकता हुआ पानी के लिए पुकार लगाता हुआ अपने ही मैंल की दुर्गंध में सांस लेने के लिए विवश हो जाएगा | 

जैसे कि हम सभी जानते हैं कि सूर्य अक्षय ऊर्जा का स्रोत है | संसार को आलोकित करने के लिए सूर्यदेव निरंतर तपा करते हैं, अपने ताप की ज्वाला में हमेशा जलते रहकर भी वह धरती के दोनों गोलार्ध में प्राण ऊर्जा का संचार करते हैं |  मेघ का अभाव कहीं जीवन ही ना सुखा डालें इसलिए सागर भी बड़वानल में जला करते हैं ताकि झुलसते जीवन वर्षा की शीतलता व फुहार से शीतलता प्रदान कर सके | सितारे हर रोज चमकते हैं ताकि मनुष्य अपनी  अहंता में ना पढ़ा रहकर विराट ब्रह्म कि प्रेरणाओ से पूरित बना रहे | अपनी हर सांस के साथ संसार भर का जहर पीने और बदले में अमृत उड़ेलने का पुण्य परोपकार वृक्षों ने कभी बंद नहीं किया |  नदियां राह में पड़ने वाले पत्थरों की ठोकर खाकर भी सबको जल दान करती है | पवन जमाने भर का दुर्गंध सहन कर सभी प्राणियों को प्रज्वलित करते हैं | पुष्प भी कांटों की चुभन का प्रवाह ना करते हुए, हंसते हुए मुस्कुराकर कहते हैं कि संसार में रहना ही जीवन की शोभा है |

जीवन का मूल प्रेरणा है भाव भरा परोपकार प्रकृति का प्रत्येक घटक इस पुण्य कार्य में संलग्न है | जीवन सतकर्मों के प्रभाव से विकसित एवं सुमन्त होता है और स्वार्थ – अहंकार के वशीभूत होकर पतन पराभव के गर्भ में चला जाता है | जीवन उनका सफल है जो औरों के काम आ सके दूसरे की सेवा कर सके प्रेरणा का प्रकाश बने सके |  अध्यात्म जगत के ध्रुवतारा कहलाने वाले शंकराचार्य मात्र 32 वर्ष में जीवन के उस मुकाम तक पहुंच गए, की कोई कल्पना तक नहीं कर सकता | उनके तर्क गंभीर चिंतन सागर के समान उमड़ते घुमड़ते महान बिचारो का या तो मंडन किया गया है या खंडन | कोई भी उनके तर्को विचारों से पार नहीं जा सका | स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि कर्तव्य एवं परोपकार उससे निभाता है जिसके मन में साहस तथा हृदय में प्रीति है | परमार्थ का जीवन इतना आसान नहीं है  – बहुत कठिन है डगर पनघट की 

 

वीर एवं पराक्रमी अपने जीवन की परवाह किए बगैर अपने लक्ष्य पर मर मिटते हैं –   हौसले हो बुलंद यदि झुकता है मजबूर आसमाँ भी

संसार में प्रत्येक इंसान का अपना स्वधर्म कर्तव्य है और उस कर्तव्य को शानदार ढंग से निभाने के लिए भगवान कुछ असर भी देता है | जो इस अवसर को लाभ उठाकर अपने कार्य में तत्पर हो जाता है उसी का जीवन सार्थक एवं प्रसन्न होता है जीवन का हर पल मूल्यवान है कौन जानता है कि जीवन का कौन सा पल-क्षण  आपको कहां से कहां तक पहुंचा दे | हर पल अपनी क्षमता के अनुसार विवेकपूर्ण किया गया श्रेष्ठ कर्म व्यक्ति को उस मुकाम की ओर ले जाता है जहां इस सुर दुर्लभ मानव जीवन की सफलता एवं सार्थकता  अनुभूति से जीवन धन्य हो जाता है

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विनम्र अनुरोध: 

इस तरह “परोपकार पर निबंध (Paropkar Par Nibandh / Essay on Philanthropy in Hindi)” यहीं पूरा होता है। हमने अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए पूरी कोशिश की है कि इस Paropkar Par Nibandh में किसी भी प्रकार की त्रुटि ना हो। फिर भी यदि आप को इस निबंध में कोई गलती दिखती है तो आप अपना बहुमूल्य सुझाव ईमेल के द्वारा दे सकते है। ताकि हम आपको निरन्तर बिना किसी त्रुटि के लेख प्रस्तुत कर सकें।

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